पाकिस्तान ने एक बार फिर दुनिया के सामने अपनी कूटनीतिक हैसियत का ढिंढोरा पीटने की कोशिश की और उसे मुंह की खानी पड़ी। ईरान और अमेरिका के बीच दशकों से चली आ रही दुश्मनी को कम करने का श्रेय लेने के चक्कर में इस्लामाबाद ने जो दांव खेला, वो उल्टा पड़ गया। हकीकत तो ये है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आपकी बात तभी सुनी जाती है जब आपके पास आर्थिक ताकत या मजबूत रणनीतिक साख हो। पाकिस्तान के पास फिलहाल इन दोनों की भारी कमी है।
ये कोई पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान ने खुद को 'शांतिदूत' के तौर पर पेश करने की कोशिश की है। लेकिन इस बार मामला थोड़ा अलग था। ईरान में बढ़ते तनाव और अमेरिका की सख्त पाबंदियों के बीच पाकिस्तान को लगा कि वो बीच-बचाव कर के खुद को ग्लोबल मैप पर फिर से प्रासंगिक बना लेगा। नतीजा क्या रहा? वाशिंगटन ने भाव नहीं दिया और तेहरान ने अपनी दूरियां कम नहीं कीं।
कूटनीति के मैदान में पाकिस्तान की नाकामी का सच
ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता करना बच्चों का खेल नहीं है। इसके लिए आपको दोनों पक्षों का भरोसा चाहिए होता है। अमेरिका के लिए पाकिस्तान अब वो भरोसेमंद साथी नहीं रहा जो वो शीत युद्ध के दौरान हुआ करता था। दूसरी तरफ, ईरान के साथ पाकिस्तान के रिश्ते हमेशा से ही संदेह के घेरे में रहे हैं, खासकर सीमा पार से होने वाली घुसपैठ और उग्रवाद के मुद्दों को लेकर।
जब आप खुद कर्ज के बोझ तले दबे हों और आपकी आंतरिक राजनीति अस्थिर हो, तो दुनिया आपकी मध्यस्थता को गंभीरता से नहीं लेती। पाकिस्तान ने सोचा था कि वो सऊदी अरब और ईरान के बीच हुए समझौते जैसा कुछ करिश्मा कर दिखाएगा, लेकिन वो भूल गया कि वहां चीन जैसा बड़ा खिलाड़ी शामिल था। बिना किसी आर्थिक बैकअप के केवल बातों से बड़ी ताकतें टेबल पर नहीं आतीं।
क्या था वो नया दांव जो दुनिया को दिखाने की कोशिश की गई
अपनी बेइज्जती को छिपाने के लिए पाकिस्तान ने हाल ही में एक नया पत्ता फेंका। उसने इसे अपनी 'शिफ्ट टू जियो-इकोनॉमिक्स' नीति का हिस्सा बताया। ये एक भारी-भरकम शब्द है जिसका इस्तेमाल वो अक्सर तब करता है जब उसकी रणनीतिक चालें नाकाम हो जाती हैं। असल में, ये दुनिया का ध्यान भटकाने की एक कोशिश थी ताकि लोग ये न पूछें कि ईरान-अमेरिका डील का क्या हुआ।
इस नए दांव में कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय व्यापार की बातें की गईं। पाकिस्तान ने दावा किया कि वो मध्य एशिया को दक्षिण एशिया से जोड़ने वाला सबसे बड़ा हब है। लेकिन सवाल वही है कि निवेश कहां से आएगा? सीपेक (CPEC) के प्रोजेक्ट्स पहले से ही सुस्त पड़े हैं। ऐसे में नए वादे करना केवल एक पीआर स्टंट जैसा लगता है।
ईरान के साथ गैस पाइपलाइन का पुराना दर्द
ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन का मुद्दा फिर से चर्चा में लाया गया। ये प्रोजेक्ट सालों से अटका हुआ है क्योंकि पाकिस्तान को डर है कि अगर उसने ईरान के साथ काम किया तो अमेरिका उस पर पाबंदियां लगा देगा। अब जब मध्यस्थता फेल हुई, तो पाकिस्तान ने फिर से इस पाइपलाइन का राग अलापना शुरू कर दिया है ताकि ईरान को खुश रखा जा सके। ये कूटनीति नहीं, बल्कि मजबूरी में लिया गया फैसला है।
अमेरिका की बेरुखी और बदलती प्राथमिकताएं
वाशिंगटन अब दक्षिण एशिया को अलग नजरिए से देखता है। उसके लिए अब पाकिस्तान वो 'जरूरी सहयोगी' नहीं है। अमेरिका की प्राथमिकताएं अब हिंद-प्रशांत क्षेत्र और चीन को घेरने पर केंद्रित हैं। ऐसे में पाकिस्तान अगर ये सोचता है कि वो पुराने रिश्तों की दुहाई देकर अमेरिका की ईरान नीति बदल देगा, तो ये उसकी सबसे बड़ी भूल है।
क्षेत्रीय स्थिरता और पाकिस्तान का दोहरा चेहरा
एक तरफ पाकिस्तान शांति की बात करता है और दूसरी तरफ उसकी अपनी सीमाओं पर तनाव कम नहीं हो रहा। अफगानिस्तान के साथ उसके रिश्ते सबसे खराब दौर में हैं। ईरान के साथ भी अक्सर सीमा पर गोलाबारी की खबरें आती रहती हैं। जब आप अपने पड़ोसियों के साथ शांति नहीं रख सकते, तो आप दो महाशक्तियों के बीच सुलह कैसे करा सकते हैं?
दुनिया अब पाकिस्तान की इस रणनीति को समझ चुकी है। बार-बार 'विक्टिम कार्ड' खेलना या खुद को शांति का मसीहा बताना अब काम नहीं आता। अंतरराष्ट्रीय मंच पर आपकी साख आपके कर्मों से बनती है, केवल बयानों से नहीं। ईरान और अमेरिका जैसे देश अपनी विदेश नीति बहुत सोच-समझकर तय करते हैं। उन्हें किसी ऐसे बिचौलिए की जरूरत नहीं है जो खुद अपनी समस्याओं में उलझा हुआ हो।
अब आगे क्या हो सकता है
पाकिस्तान के लिए अब सबसे जरूरी ये है कि वो बड़े-बड़े दावे करना बंद करे। उसे अपनी अर्थव्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा पर ध्यान देने की जरूरत है। जब तक कोई देश आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं होता, तब तक उसकी आवाज में वो वजन नहीं आता। ईरान और अमेरिका के मामले में टांग अड़ाने के बजाय उसे अपनी सीमा विवादों को सुलझाने पर ध्यान देना चाहिए।
अगला कदम ये होना चाहिए कि पाकिस्तान अपनी विदेश नीति को यथार्थवाद (Realism) की जमीन पर लाए। ख्याली पुलाव पकाने से न तो निवेश आएगा और न ही बेइज्जती कम होगी। उसे समझना होगा कि कूटनीति फोटो खिंचवाने या प्रेस रिलीज जारी करने से कहीं ज्यादा गहरी होती है। अगर वो अपनी गलतियों से नहीं सीखता, तो आने वाले समय में वो और भी ज्यादा अलग-थलग पड़ सकता है। खुद को सुधारने की शुरुआत घर से ही करनी होगी।